कुरुक्षेत्र का सूर्य ग्रहण मेला – इस अवसर पर देश-विदेश से पहुंचते हैं लाखों श्रद्धालु

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आदिकाल से ही भारतीय संस्कृति में सूर्य व चन्द्रग्रहण के मौके पर नदियों में स्नान करने की परम्परा रही है। पुराणों में सूर्यग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र तथा चन्द्रग्रहण के अवसर पर काशी में किए गए स्नान व दान का विशेष महत्व बताया गया है। कुरुक्षेत्र का सम्बन्ध जहां मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रसिद्ध है। वहीं सूर्य तथा अदिति वन के रूप में भी इस स्थल का विशेष महत्व रहा है। महाभारत युद्ध से पहले भी कुरुक्षेत्र की महिमा एक प्रसिद्ध तीर्थ के रूप में रही है। कुरुक्षेत्र के संदर्भ में सूर्यग्रहण एवं सूर्य उपासना से सम्बन्धित रहने का वर्णन महाभारत के वन पर्व एवं उद्योग पर्व तथा वामन पुराण एवं भागवत पुराण से सिद्ध होता है। धार्मिक दृष्टि से कुरुक्षेत्र एक विशिष्ट तीर्थ स्थल के रूप में भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में विख्यात है।

सूर्य पूजा का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। भारत में सूर्य की शक्तिशाली देवता के रूप में पूजा की जाती है। पौराणिक काल में प्रारंभ हुई पंचदेवोपासना यानी सूर्य, विष्णु, गणेश, दुर्गा और शिव में सौर-उपासना का विशेष महत्व रहा है। गायत्री और सावित्री को भी सूर्य का ही रूप माना गया है। ऋग्वेद में सूर्य को विश्व की आत्मा कहा गया है जोकि संजीव व निर्जीव दोनों ही विश्वों का संचालन करता है। सूर्य की किरणों में उपचार की एक अनोखी शक्ति है। सूर्य पूजा से ही भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब को कुष्ठ रोग से मुक्ति मिली थी। कहा जाता है कि कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के अवसर पर स्नान करने से एक हजार अश्वमेध यज्ञ के बराबर फल मिलता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी महाभारत काल में यहां स्नान किया था। यह भगवान ब्राह्मा की तपोभूमि है और यहां भगवान श्री कृष्ण ने गीता का कर्म का उपदेश भी दिया था। अधर्म पर धर्म की विजय का महाभारत का युद्ध इसी पवित्र भूमि पर लड़ा गया था और महाराज कुरु ने यहीं पर सोने का हल चलाकर कृषि युग का सूत्रपात किया था।

सूर्यग्रहण के अवसर पर देश-विदेश के लाखों श्रद्धालु यहां आकर स्नान करते हैं, भगवान का भजन-कीर्तन करते हैं। साधु संन्यासी तपस्या करते हैं। गांवों से आए ग्रामीण भक्त एवं महिलाएं भक्ति रस में झूमती नजर आती हैं। कुरुक्षेत्र की इस पावन भूमि पर मुख्य रूप से प्राचीन सन्निहित सरोवर एवं ब्राहृ सरोवर में सूर्यग्रहण के अवसर पर स्नान करने का माहात्म्य बताया गया है। कुरुक्षेत्र का सूर्यग्रहण मेला विश्व प्रसिद्ध है। आंकड़ों के अनुसार पिछले पांच हजार वर्षों में ग्यारह हजार आठ सौ ग्रहण लगे हैं, जिनमें से करीब चार हजार सूर्य ग्रहण का उल्लेख आता है।

मान्यता है कि सूर्यग्रहण पर कुरुक्षेत्र के सरोवरों में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। ग्रहण काल में यहां स्नान व दान करने से 1000 अश्वमेध यज्ञों के बराबर फल मिलता है, यही कारण है कि यहां आस्था का समुद्र लहराता देखा जा सकता है। मान्यता है कि अमावस्या पर देशभर के तीर्थों का जल कुरुक्षेत्र के सन्निहित सरोवर में एकत्रित होता है। तीर्थों का जल इस सरोवर में एकत्रित होने से ही इस सरोवर का नाम सन्निहित पड़ा है।

उसी प्रकार ब्राहृसरोवर प्रजापति ब्राहृ जी के नाम से संबन्धित है इसीलिए इस सरोवर का नाम ब्राहृसर या ब्राहृसरोवर पड़ा। महाभारत के वन पर्व में बताया है कि मानव के ब्राहृ तीर्थ में स्नान करने से अन्य जाति के लोग भी ब्रााहृणत्व को प्राप्त करते हैं। वामन पुराण के अनुसार इस तीर्थ की स्थापना स्वयं ब्राह्मा जी ने सरस्वती के तट पर की थी और यहीं पर उन्होंने सृष्टि रचने की इच्छा से चारों वर्णों को उनकी योग्यता के अनुसार बांटा है। ब्राहम सरोवर व सन्निहित सरोवर में पहले पवित्र सरस्वती नदी का जल आता था। लेकिन अब सतलुज नदी का जल भाखड़ा नहर के द्वारा पहुंचता है। माना जाता है कि सतलुज में पवित्र मानसरोवर से जल आता है। लिहाजा यहां स्नान करने से मानसरोवर में स्नान का भी फल मिलता है।

श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में भी महाभारत युग से कई वर्ष पूर्व कुरुक्षेत्र में हुए खग्रास सूर्यग्रहण का वर्णन मिलता है। इस ग्रहण के अवसर पर भारत के कई प्रदेशों जैसे अंग, मगध, वत्स, पांचाल, काशी, कौशल के अनेक राजा-महाराजा बड़ी संख्या में स्नान करने कुरुक्षेत्र आए थे। आज भी नेपाल, बर्मा सहित कई देशों से श्रद्धालु सूर्यग्रहण के अवसर पर यहां पहुंचते हैं।

श्री कृष्ण संग्रहालय के उपनिदेशक राजेश पुरोहित के अनुसार भागवत् पुराण में वर्णन है कि द्वारिका के दुर्ग को अनिरुद्ध कृतवर्मा को सौंपकर भगवान श्रीकृष्ण, अक्रूर, वासूदेव, उग्रसेन, गद, प्रद्युम्न, साम्ब आदि यदुवंशी व उनकी स्त्रियों एवं सगे सम्बधियों के साथ कुरुक्षेत्र स्नान के लिए पहुंचे थे। बृजमंडल से भी संख्या में गोप-गोपिकाएं यहां स्नान करने आए थे। यहां नंद जी से मिलकर वासुदेव अपनी विपत्ति के दिनों को याद करके प्रेमाश्रु बहाने लगे थे। बलराम व श्रीकृष्ण तो अपने पालक माता-पिता नन्द यशोदा से लिपट पड़े थे।

गोप-गोपियों से मिलने के उपरांत श्रीकृष्ण की कुन्ती व द्रोपदी सहित पाण्डवों से भेंट हुई। द्रोपदी व श्रीकृष्ण की पत्नियों के बीच चर्चा भी श्रीमद्भागवत के इस अध्याय में वर्णित है। उड़ीसा की पट्टचित्र शैली में निर्मित चित्रों में सूर्यग्रहण के अवसर पर श्रीकृष्ण की कुरुक्षेत्र यात्रा को बड़े आकर्षक ढंग से दिखाया गया है। इसके अतिरिक्त यहां एक प्रदर्शनी में सूर्यग्रहण के विभिन्न क्षणों को भी छायाचित्रों के माध्यम से दिखाया गया है।

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